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	<title>Secular Haryana</title>
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	<description>Live and Let Live</description>
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		<title>VISION</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 15:05:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi]]></category>

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		<description><![CDATA[मनुष्य को जाति,धर्म,गोत्र,आदि के प्रतीक के रूप में देखना नागरिक भावना के खिलाफ है &#124; यह अवैज्ञानिक  भी है&#124; वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं को ऐतिहासिक सन्दर्भों में देखना और उनके विकासशील चरित्र को पहचानना &#124;नागरिक का अर्थ है ऐसा इंसान जिसमें आत्म चेतना हो ,जो समाज के साथ सक्रिय संम्बंध बनाये [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मनुष्य को जाति,धर्म,गोत्र,आदि के प्रतीक के रूप में देखना नागरिक भावना के खिलाफ है | यह अवैज्ञानिक  भी है| वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं को ऐतिहासिक सन्दर्भों में देखना और उनके विकासशील चरित्र को पहचानना |नागरिक का अर्थ है ऐसा इंसान जिसमें आत्म चेतना हो ,जो समाज के साथ सक्रिय संम्बंध बनाये ,जिसमें सही गल्त को पहचानने की क्षमता हो,जो स्वयं निर्णय ले सकता हो और जिसकी पहचान एक व्यक्ति के रूप में की जा सके | </p>
]]></content:encoded>
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		<title>BITTER TRUTH</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 15:03:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[कडुआ सच
मेरे दादा जी की शादी मेरी दादी से कर दी गयी
उनकी कोई देखा दाखि नहीं थी बस पडदादा गए
शादी पक्की करके ही लोटे थे और एक दिन सात
फेरे दिवा दिए और घर बस गया २० प्रतिशत भी
हमारे दादा दादी की रुचियाँ एक जैसी नहीं थी
बहुत  बार लड़ते देखा उनको प्यार की बातें तो
करते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कडुआ सच<br />
मेरे दादा जी की शादी मेरी दादी से कर दी गयी<br />
उनकी कोई देखा दाखि नहीं थी बस पडदादा गए<br />
शादी पक्की करके ही लोटे थे और एक दिन सात<br />
फेरे दिवा दिए और घर बस गया २० प्रतिशत भी<br />
हमारे दादा दादी की रुचियाँ एक जैसी नहीं थी<br />
बहुत  बार लड़ते देखा उनको प्यार की बातें तो<br />
करते कभी नहीं देखा डांट मारते थे हमपर दोनों<br />
मेरे माता पिता की शादी भी मेरे गाँव के दो लोग<br />
दादा के साथ गए और हाँ करके ही लोटे वे  लोग<br />
माता पिता भी गाँव के बाहार नौकरी पर शहरों में<br />
रहे मेरी माँ घाघरा पहनकर  होशियार पुर गयी<br />
टेशन पर पुलिश वाले को शक हुआ की मेरा पिता<br />
किसी गाँव की लड़की को भगा कर लेजा रहा है<br />
बताया तो समझा वह मगर माँ ने एकदम सलवार<br />
पहन ली और घाघरे को हमेशा हमेशा के लिए भूली<br />
उनके प्यार के कारण हम सात भाई बहन पैदा हुए<br />
चार बहनें और एक भाई जिन्दा है फिर मेरी शादी हुई<br />
लड़की देखी खतों किताबत की और शादी हो गयी<br />
मेरे माँ बाप के प्यार के कारण मैं पैदा हुआ इसमें<br />
मेरी कोई भूमिका नहीं थी मगर पैदा होने के बाद<br />
क्या मैं वही सब करूँ जो मेरे माँ बाप कहते हैं या<br />
मेरा भी कोई अलग वजूद है यही है मेरा सवाल आज<br />
६१ साल की उमर में !<br />
मेरे बेटे और पुत्र वधु की अपनी कोई हैसियत है भी<br />
नहीं या वो प्रोटो कोपी की तरह हमारा अनुशरण करेँ<br />
अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर!<br />
 या हमें खुसी होना चाहिए अपने उनके अस्तित्व के विकास पर !<br />
यदि हाँ तो फिर आज प्यार पर इतनी मारा मारी क्यों ?</p>
]]></content:encoded>
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		<title>THINK GLOBALLY, ACT LOCALLY</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:58:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi]]></category>

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		<description><![CDATA[स्थानीयता और विश्वदृष्टि
सभी लोगों को भागीदारी के मौके मिल सकें और हम मौजूदा वैश्वीकरण या नवउपनिवेशवाद से लड़ सकें &#124; इसके लिए जरूरी है क़ि स्थानीयता को महत्व दिया जाये और वहां के संघर्षों को साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से जोड़ा जाये &#124;शहरी इलाकों के इलावा गाँव को बुनियादी इकाई के रूप में रेखांकित करना जरूरी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>स्थानीयता और विश्वदृष्टि<br />
सभी लोगों को भागीदारी के मौके मिल सकें और हम मौजूदा वैश्वीकरण या नवउपनिवेशवाद से लड़ सकें | इसके लिए जरूरी है क़ि स्थानीयता को महत्व दिया जाये और वहां के संघर्षों को साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से जोड़ा जाये |शहरी इलाकों के इलावा गाँव को बुनियादी इकाई के रूप में रेखांकित करना जरूरी है | इस स्तर  पर &#8216;परिवर्तन &#8216; के लिए यहीं के स्रोतों का इस्तेमाल और लोगों क़ि पहलकदमी क़ि जरूरत है | यह इस समय क़ि ऐतिहासिक जरूरत है क्योंकि &#8216;वैश्वीकरण&#8217; के नाम पर स्थानीयता को नष्ट किया जा रहा है और &#8216;ग्लोबल<br />
गाँव  &#8216; का नारा दिया जा रहा है | इसके पीछे सभी को अंध-उपभोग्ता के रूप में ढालने का मन्तव्य छिपा है | एक और स्थानीयता को ग्लोबल मार्केट में भुनाया जा रहा है , दूसरी ओर वैश्वीकरण किया जा रहा है | यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं |इससे लड़ने के लिए &#8216;स्थानीयता &#8216;को अपम\ना संघर्ष करना होगा ओर अपना एक स्वतंत्र स्वरूप ग्रहण करते हुए साम्रज्यवाद विरोधी मुहीम में शामिल होना होगा |स्थानीयता का प्रयोग जातिवादी,धार्मिक,कट्टरपंथी ताकतें पुनरूत्थानवाद  के लिए कर राही हैं | &#8216;धरती पुत्र &#8216;इसका ठेकेदार है |स्थानीयता के सन्दर्भ में         इन कट्टरपंथी ताकतों के चंगुल से निकल कर एक नागरिक समाज क़ि परिकल्पना करनी होगी| गाँव के स्तर पर नागरिक समाज क़ि परिकल्पना के बिना जातिवादी ओर अंध-उपभोग्तावाद से नहीं बचा जा सकता |गाँव में सामूहिकता क़ि एक लम्बी परंपरा रही है इसको पहचानने क़ि जरूरत है |<br />
&#8211; </p>
]]></content:encoded>
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		<title>KALA DHANDHA</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/kala-dhandha/</link>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:57:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[कहीं भी सही काम नहीं पाता हूँ मैं
सर पकड़ कर बैठ जाता हूँ मैं
सोचता हूँ कोई आकर मुझे उठाये———
काले काम काले धंधे बुला रहे हैं
इनमे कई लोग बेंतहा कमा  रहे हैं
मुझे भी यही रास्ता दिखा रहे हैं
डर लगता   है मुझको  कोई ढाढस बंधवाये ——
मेरे जैसे बहुत काले अंधेरो में खो गए
गलत [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कहीं भी सही काम नहीं पाता हूँ मैं<br />
सर पकड़ कर बैठ जाता हूँ मैं<br />
सोचता हूँ कोई आकर मुझे उठाये———<br />
काले काम काले धंधे बुला रहे हैं<br />
इनमे कई लोग बेंतहा कमा  रहे हैं<br />
मुझे भी यही रास्ता दिखा रहे हैं<br />
डर लगता   है मुझको  कोई ढाढस बंधवाये ——<br />
मेरे जैसे बहुत काले अंधेरो में खो गए<br />
गलत राहों  के आदि बहुत साथी हो गए<br />
परिवार भी बस दो चार बार रो गए<br />
बिना काले के हमारा पेट कैसे भर पाए —–</p>
]]></content:encoded>
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		<title>CHILD LEARNS FROM PARENTS</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/child-learns-from-parents/</link>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:55:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[मैंने देखा है अपने माँ बाप को लड़ते हुए
रोजाना इस या उस बात पर झगड़ते हुए
माँ कहती पापा को क्यों पड़ौसिन को तकते
माँ को पीटते हाथ कभी नहीं  उनके थकते
बच्चे बड़े हो रहे इसका उनको ख्याल नहीं
क्या असर पड़ रहा इसका उनको मलाल नहीं
बचपन था हमें ज्यादा चीजों का पता न था
तरुनाई की उमर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मैंने देखा है अपने माँ बाप को लड़ते हुए<br />
रोजाना इस या उस बात पर झगड़ते हुए<br />
माँ कहती पापा को क्यों पड़ौसिन को तकते<br />
माँ को पीटते हाथ कभी नहीं  उनके थकते<br />
बच्चे बड़े हो रहे इसका उनको ख्याल नहीं<br />
क्या असर पड़ रहा इसका उनको मलाल नहीं<br />
बचपन था हमें ज्यादा चीजों का पता न था<br />
तरुनाई की उमर आई बच्चों  का खाता न था<br />
पिता पड़ौसिन का छुप  कर मिलना समझा<br />
अवैध संम्बंधों  पर माँ का हिलना समझा<br />
सुरता कईबार मुझे बुलाकर प्यार में सहलाता<br />
बहुत खुश होती मैं दानवी रूप समझ न आता<br />
एक दिन वह रूप उसका सामने आ ही गया<br />
देख के उसकी हरकतें सिर चकरा ही गया<br />
ये आँखें बीस चालीस साठ साल की बताऊँ<br />
उमर कोई सीमा नहीं बीती उसका हाल सुनाऊँ<br />
आदर्श संस्कारों की उम्मीद कैसे विद्वान् करते हैं<br />
देखो कैसे बच्चियों के शराब पीके पर कतरते हैं  </p>
]]></content:encoded>
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		<title>AKELAPAN</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/akelapan/</link>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:53:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[मियां बीबी रहगे ऐकले तीनो बालक लेगे उडारी देखो&#124;
के के सपने संजोये थे जिब हुई ये संतान म्हारी देखो &#124;
बचपन उनका सही बीते  करे दीन रात  काले हमनै
क्याहें   की परवाह करी ना बहा पसीना पाले हमनै
पढ़न खंदाये लाड   लड़ाए  तनखा खर्ची सारी देखो&#124;
कदे रुसजया कदे कुबध करै  [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मियां बीबी रहगे ऐकले तीनो बालक लेगे उडारी देखो|<br />
के के सपने संजोये थे जिब हुई ये संतान म्हारी देखो |<br />
बचपन उनका सही बीते  करे दीन रात  काले हमनै<br />
क्याहें   की परवाह करी ना बहा पसीना पाले हमनै<br />
पढ़न खंदाये लाड   लड़ाए  तनखा खर्ची सारी देखो|<br />
कदे रुसजया कदे कुबध करै  यो छोरा सबते छोटा मेरा<br />
बड़ी छोरी हुई सयानी शादी का दुःख था मोटा मेरा<br />
बिचली  छोरी का के जिकरा वा तिनुओं  मैं न्यारी देखो|<br />
एक अम्बाला दूजी  सूरत मैं परिवार अपने चला रही<br />
ये मोबाइल साँझ सबेरी   हमते रोजाना ही  मिला रही<br />
बात  करें  दुनिया भर की उमर बीतती जारी देखो<br />
कई बार  बहोत ऐकले  मियां बीबी हम  हो  ज्यावें सें<br />
झगडा   करल्याँ  छोटी  बात पै  लड़भीड़  सो ज्यावें सें<br />
रणबीर  सिंह  आप  बीती  सै कलम  मेरी  पुकारी   देखो|</p>
<p>&#8211; </p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>CONCOCTED HISTORY</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/concocted-history/</link>
		<comments>http://secularharyana.com/2010/07/27/concocted-history/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:52:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[छदम इतिहास का सहारा लिया जा रहा है
छदम विज्ञानं को स्थापित किया जा रहा है
तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा भरपूर
देवी शक्तियों की फैंटेसी हमें दिखायेंगे जरूर
भूत प्रेत आत्मा और आधार शैतान बनाया
अंध विश्वास असंगति को यहाँ खूब बढाया
सेक्स हिंसा  नशे का पैकेज पूरा थमा दिया
लड़कों लड़कियों को गलत रास्ता दिखा दिया
गफलत में नहीं [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>छदम इतिहास का सहारा लिया जा रहा है<br />
छदम विज्ञानं को स्थापित किया जा रहा है<br />
तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा भरपूर<br />
देवी शक्तियों की फैंटेसी हमें दिखायेंगे जरूर<br />
भूत प्रेत आत्मा और आधार शैतान बनाया<br />
अंध विश्वास असंगति को यहाँ खूब बढाया<br />
सेक्स हिंसा  नशे का पैकेज पूरा थमा दिया<br />
लड़कों लड़कियों को गलत रास्ता दिखा दिया<br />
गफलत में नहीं किया सोची समझी चाल है<br />
लूट को न पहचानें इसलिए बिछाया जाल है<br />
युवक युवती सपने देखें मस्त रहें भोग में<br />
खाएं पियें मौज करेँ न पड़ें सोच के रोग में<br />
क़िस्मत को दोष दें और बस भटकते रहें<br />
दुश्मन को आका मानें बस सिर पटकते रहें<br />
दारू के ठेकेदार कहें दारू पीना ठीक नहीं है<br />
मुनाफाखोर कहें मुनाफे पे जीना ठीक नहीं है<br />
खुद के हम खुद ही दुश्मन होते जा रहे हैं<br />
अपनी मौत के गीत हम को खूब भा रहे हैं<br />
भोगो भोगो पता नहीं कब दुर्घटना हो जाये<br />
यही तो जिंदगी है बेशक मानवता खो जाये </p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>Changing Village</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/changing-village/</link>
		<comments>http://secularharyana.com/2010/07/27/changing-village/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:49:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[जीने के सभी  आयाम बदल गए
गाँव  के जामुन आम बदल गए
चोटी हमारी साथ छोड़ गयी आज
घाघरा  भी हुआ है हमसे नाराज
कुँए और देखो तालाब बदल गए
कई सवालों के जवाब बदल गए
पुराने और नए की जंग जारी है
आज बुजुर्गों का कल तो  हमारी है 
]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जीने के सभी  आयाम बदल गए<br />
गाँव  के जामुन आम बदल गए<br />
चोटी हमारी साथ छोड़ गयी आज<br />
घाघरा  भी हुआ है हमसे नाराज<br />
कुँए और देखो तालाब बदल गए<br />
कई सवालों के जवाब बदल गए<br />
पुराने और नए की जंग जारी है<br />
आज बुजुर्गों का कल तो  हमारी है </p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>YE LOG</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:48:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Poems]]></category>

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		<description><![CDATA[ये अनगिनत हाथ ये दिमाग
भारत की तस्वीर बदल सकते
हमने इन्हें भीड़ बना दिया
हिस्साब तो मांगेगी यह भीड़
रखना पूरा हिस्साब लीख कर 
]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ये अनगिनत हाथ ये दिमाग<br />
भारत की तस्वीर बदल सकते<br />
हमने इन्हें भीड़ बना दिया<br />
हिस्साब तो मांगेगी यह भीड़<br />
रखना पूरा हिस्साब लीख कर </p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://secularharyana.com/2010/07/27/ye-log/feed/</wfw:commentRss>
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		</item>
		<item>
		<title>GOTRA DOES NOT HAVE SCIENTIFIC BASES</title>
		<link>http://secularharyana.com/2010/07/27/gotra-does-not-have-scientific-bases/</link>
		<comments>http://secularharyana.com/2010/07/27/gotra-does-not-have-scientific-bases/#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 14:45:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>R.S.Dahiya</dc:creator>
				<category><![CDATA[Current Affairs]]></category>

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		<description><![CDATA[सत्ते, नफे,फत्ते ,सरिता ,कविता,सविता अर धापा ताई शनिचर नै फेर कठ्ठे  होगे अर आपस मैं बतलाये   &#124;सत्ते बोल्या- गोतां के नाम पर रोज अखबारां मैं किमे ना किमे आया रहवै सै &#124;मानस जात   गोत मैं बाँट कै गेर दिए &#124;हरयाणवी,भारतीय ,मानवता ,इंसानियत ये हर्फ़ ही  गायब होगे  अखबारां [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सत्ते, नफे,फत्ते ,सरिता ,कविता,सविता अर धापा ताई शनिचर नै फेर कठ्ठे  होगे अर आपस मैं बतलाये   |सत्ते बोल्या- गोतां के नाम पर रोज अखबारां मैं किमे ना किमे आया रहवै सै |मानस जात   गोत मैं बाँट कै गेर दिए |हरयाणवी,भारतीय ,मानवता ,इंसानियत ये हर्फ़ ही  गायब होगे  अखबारां माँ तै|सविता बोली-गोत्र म्हारी सांस्कृतिक इकाई सै जिस्ते  हम दहिया हुड्डा मलिक के हिस्साब तै न्यारे न्यारे सां अर ब्याह शादियाँ मैं इसका ख्याल बी रखा  सां अक गोत की गोत मैं ब्याह ना होवै |गाम की गाम मै ब्याह ना होवै |नफे बोल्या-नानी के गोत मैं ब्याह ना होवै अर दादी के गोत मैं ब्याह ना होवै |फत्ते बोल्या- और के या  तो म्हारी बहोत पुराणी परंपरा सै ना | सरिता बोली -इसका वैज्ञानिक आधार बताया सै वैज्ञानिका  नै| बीमारी भी कम होवें इसे करकै | कविता बोली -बेबे  ये दो बात न्यारी न्यारी सें |गोत का वैज्ञानिक आधार अर बीमारी का कम ज्यादा होना |म्हारे दिमाग मैं तो या बात घुमै सै ना अक दहिया गोत्र का मतलब यूं सै अक यूं प्योर निखालस  दहिया का खून सै अर हुड्डा का मतलब यो सै अक यो प्योर हुड्डा का खून सै | नफे बोल्या-इसमें बी किमे शक सै के ?कविता बोली-शक तो कोन्या पर  शदियां बीतली फेर इसके वैज्ञानिक आधार के बारे इस ढाला तो कदे हमनै सोच्या ए कोन्या |सरिता बोली-किस ढाला ?सविता बोली &#8211; कविता ठहरी साइंटिस्ट |किमे ना किमे तो फान्चर ठोकै कै रह्वैगी |कविता बोली- दहिया, हुड्डा ,मलिक गोतां का प्योर खून कोन्या इसमें मिलावट सै |घने और गोतां का खून शामिल सै इसमें |सविता बोली -देख्या मैं कहूं थी ना अक या किमे ना किमे उलटी बात ल्यावैगी |इब दहिया के खून की प्योरिटी पै सवालिया निशान ला दिए इसनै |कविता बोली- थारी समझान की खातिर एक और उदाहरन बताऊँ |हवन अलग अलग मौक्यां पर करना म्हारी संस्कृति का हिस्सा सै या बात ठीक पर नयों कहना अक इस्ते हवा की  शुधि हो सै यो गैरवैज्ञानिक समझ सै |क्योंकि जिब कोए चीज जलेगी तो कार्बन डाई ऑक़ साइड पैदा होगी जिस्ते प्रदूषण बढेगा |शुधि कोन्या होवै |न्योए गोत म्हारी सांस्कृतिक पहचान होते हुए भी वैज्ञानिकता के हिस्साब तै दहिया का प्योर खून नहीं सै इसमें दहिया के प्योर जीन कोन्या |सविता बोली -क्यों मरण  के कम करै सै |इब तो कहदी ये बात आगे मतना कहियो | कविता बोली- सच बात सै या अर मेरा दादा आर्य समाजी था वो नयों कहग्या था अक सच्चाई तै पाछे नहीं हटना चाहिए चाहे किमे हो जाओ |सविता बोली- तो थोडा  खोल कै बता |कविता समझान लग्गी -मान  लिया म्हारा सड़ दादा था नफे अर सड़ दादी थी भरपाई |इनके दो दो गोत थे खून मैं माँ का अर बाप का | म्हारे पड़ दादा अर पड़ दादी के खून मैं चार चार गोत होगे | दादा दादी के खून मैं आठ आठ गोत होगे | माता  पिता के खून मैं सोला सोला गोत होगे |नयोंए चालदें चालदें पोते के बेटे के बेटे के खून मैं दो सो छप्पन गोतां का खून होग्या |अर इस बेल नै और आगे नै चलाओ तो हिस्साब लाल्यो कितने गोतां का खून शामिल होज्या सै|प्योर खून के हिस्साब तै दहिया का कोए आधार नहीं सै अर नयोंए हुड्डा अर मलिक इन सबका |हाँ सांस्कृतिक तौर पर हम माना सां वा न्यारी बात सै|फत्ते बोल्या- फेर आपां ये  दहिया, हुड्डा, मलिक के गोतां के खामैखा पगड़ बांधें हाँडा सां? कविता बोली- मने घना तो बेरा ना फेर एक बलबीर सिंह मलिक सै इंजीनीयर उसनै कितै इंटरनेट पै लिख्या अर डाक्टर रणबीर नै वो फेसबुक पर गेर दिया उड़े मने पढ़ लिया अर थारे ताहीं बता दिया विस्तार तै लीख राख्या सै उसमें |नफे सिंह -कविता तूं  अर यो बलबीर अर रणबीर बच कै रहियो | थामनै भिरडा  के छत्ते मैं हाथ दे दिया सै | कविता बोली -कई सौ साल पहले ब्रुनो भी जिन्दा जला दिया था जिब उसनै नयों कहया अक धरती सूरज के चारों कान्ही घूमै सै सूरज धरती के चारों कांहीं कोन्या घूमता |इस गोत आली  बात पर खुलकै बहस होनी चाहिए अर सच्चाई साहमी आनी चाहिए |स्वामी    दयानंद भी तो यही कहया करदे अक बहस करो | आई किमे समझ मैं ?<br />
रणबीर     </p>
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